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मुझे कभी नहीं लगा कि मैं घर से दूर हूँ

जब मैं 22 साल की उम्र में पैका आया था, तब नहीं सोचा था कि यहाँ बिताए साल इतनी जल्दी बीत जाएंगे। आज 60 साल की उम्र में सेवानिवृत्त होते हुए पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि काम के लिए आया था, लेकिन यहाँ बने रिश्तों ने इस जगह को मेरा घर बना दिया।

जब भी मुझे कुछ नया सीखना होता, कोई न कोई सिखाने के लिए तैयार रहता। मदद की ज़रूरत पड़ती, तो मैं बिना झिझक किसी से भी कह सकता था। इस सहयोग ने मुझे सीखते रहने और नई ज़िम्मेदारियाँ निभाने का हौसला दिया।

यहाँ के लोगों का अपनापन, साथ बिताए पल, बातचीत और हँसी-मज़ाक हमेशा याद रहेंगे। मुझे कभी नहीं लगा कि मैं अपने गाँव से दूर हूँ या अजनबियों के बीच रह रहा हूँ।

मैंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा यहाँ बिताया है और इन वर्षों में बहुत खुश रहा हूँ। आज सेवानिवृत्त होते हुए उन सभी का आभारी हूँ, जिन्होंने इस सफ़र को इतना खास बनाया। आप सबके साथ के कारण ही यह लंबी यात्रा इतनी जल्दी बीत गई।

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